वोटर रिवीजन या वोटर उलझन? मैनपुरी में SIR पर डिंपल यादव का तीखा वार

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

उत्तर प्रदेश की मैनपुरी लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने जिले में चल रहे Special Intensive Revision (SIR) अभियान के दूसरे चरण को लेकर प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
उन्होंने मैनपुरी के जिलाधिकारी अंजनी कुमार को एक औपचारिक पत्र लिखकर न सिर्फ अभियान की देरी बल्कि उसकी अव्यवहारिक कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

डिंपल यादव का आरोप है कि SIR का दूसरा चरण करीब 10 दिन की देरी से शुरू हुआ, जिससे पूरे कार्यक्रम की टाइमलाइन गड़बड़ा गई है। इसका सीधा असर उन मतदाताओं पर पड़ रहा है, जिनका डेटा 2003 की मतदाता सूची से मैप नहीं हो पा रहा

नोटिस सिस्टम पर सीधा हमला

सांसद ने पत्र में कहा है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत हर AERO (Assistant Electoral Registration Officer) एक दिन में औसतन सिर्फ 150 नोटिस ही जारी कर पा रहा है।

डिंपल यादव ने इसे slow, inefficient और ground reality से कटा हुआ सिस्टम बताया।

उनका कहना है कि जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड पुराने डेटा से मैच नहीं कर रहा, उन्हें नोटिस बहुत देर से भेजे जा रहे हैं और उसके बाद केवल 7 दिन में जवाब देने की समयसीमा तय कर दी गई है—जो आम नागरिक के लिए लगभग असंभव है।

‘समय पर निस्तारण संभव नहीं’

पत्र में डिंपल यादव ने साफ शब्दों में लिखा कि मौजूदा प्रक्रिया के तहत जनपद के सभी no-mapping voters के मामलों का समय पर समाधान संभव नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यही रफ्तार रही, तो SIR अभियान का मूल उद्देश्य— शुद्ध और निष्पक्ष मतदाता सूची—खुद ही खतरे में पड़ जाएगा।

उनकी मांग है कि नोटिस तुरंत जारी हों। समयसीमा बढ़ाई जाए और प्रक्रिया को practical बनाया जाए। ताकि मतदाताओं को अनावश्यक मानसिक और प्रशासनिक परेशानियों से न गुजरना पड़े।

पहले भी उठा है विरोध

डिंपल यादव से पहले सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव भी SIR अभियान को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने यहां तक कहा था कि देश में इस तरह के SIR की कोई ज़रूरत नहीं है और यह प्रक्रिया सत्ता को बनाए रखने के लिए अपनाए जा रहे हथकंडों जैसी दिखती है।

उनका बयान साफ इशारा करता है कि विपक्ष इस मुद्दे को लोकतंत्र बनाम प्रबंधन की लड़ाई के रूप में देख रहा है।

प्रशासन का पक्ष

प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी नवदीप रिन्वा के मुताबिक, जिन मतदाताओं का विवरण 2003 के रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रहा, उन्हें नोटिस भेजे जा रहे हैं।

दावे और आपत्तियां: 6 जनवरी से 6 फरवरी, अंतिम मतदाता सूची प्रकाशन: 6 मार्च 2026

लेकिन सवाल वही है क्या सिस्टम की रफ्तार लोकतंत्र की जरूरतों से मेल खा रही है?

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